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तुम भी लौटना

तुम भी लौटना छूटते शहर से मैं कभी अपना सब कुछ साथ नहीं लाया, कुछ स्मृतियाँ, कुछ कोने… वहीं छोड़ दिए। जो लोग पीछे रह गए, उनसे कभी वक्त वापस नहीं माँगा, जो दिया था, वो उनका ही रहा। अपने प्रेम के पास भी मैंने अपना एक हिस्सा छोड़ दिया, कि कुछ तो पीछे रहना चाहिए— फिर कभी लौट आने के लिए। तुम भी लौटना… पर इस बार, यहीं ठहर जाने के लिए।

तुमसे मिलना

तुमसे मिलना, तुम्हें छूना, साथ होना—एक एहसास, बस तुम्हारी कल्पना में जीना—कुछ और ही बात। जैसे तुम्हारे प्रेम में डूबना—सच में जीना, और बिना तुम्हारे—महज़ साँसों का सिलसिला।

ठहराव

ठहराव एक पूरी उम्र बिताई जा सकती है, सिर्फ़ प्रेम की तलाश में। पर सच तो यही है— एक प्रेमी को ठहराव बनकर, सबके हिस्से आना चाहिए।

तुम्हारा जाना

तुम्हारा जाना मेरे हिस्से कभी नहीं आए वो दरवाज़े, जिन्हें खोलकर मैं तुम्हारा स्वागत कर सकूँ। मेरे हिस्से बस ये अधखुली खिड़कियाँ आईं, जिनसे मैंने सिर्फ़ तुम्हारा जाना देखा…

तुम नहीं भी आओगे…

तुम नहीं भी आओगे… तो भी एक दिन कोई रास्ता ले ही आएगा, तुम्हारे शहर की दहलीज़ तक। कोई नया नाम पुकारेगा मुझे, शायद तुम्हारी ही तरह हाल पूछते हुए। लोग बदलेंगे, बातें भी… पर जो नहीं लौटेगा, वो मैं हूँ— जो कभी सिर्फ़ तुम्हारे आगे था, जो सिर्फ़ तुम्हारे लिए था।

भूले कहाँ, जो याद करूँ!

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भूले कहाँ, जो याद करूँ, मौन हूँ, तो किससे बात करूँ? तेरी आँखें ही नहीं चाहती देखना, फिर कैसे मैं जज़्बात कहूँ? तेरे सपने कहीं और बसते, मेरे ख्वाब तेरे बिना अधजले। धुआँ-धुआँ रास्ते तकते रहे, जहाँ कभी तेरा नाम लिखा था। तेरे घने काले गेसू कहूँ, या अपनी स्याह रातों का हिसाब दूँ? तेरी आँखें ही नहीं चाहती देखना, फिर कैसे मैं जज़्बात कहूँ?

गुम हो जाते तो कोई और बात थी!

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तुम्हें ढूंढने निकलूँ भी तो क्या फायदा, रास्ते वही हैं, मोड़ भी पहचाने से, मगर मंज़िल अब कहीं और मुड़ गई। गुम हो जाते तो कोई और बात थी, कम से कम तलाश का एक सबब तो होता, पर तुम तो यहीं हो— बस अब पहले जैसे नहीं।

तुम मेरे ना हुए, तो शिकवा कैसा?

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 तुम मेरे ना हुए, तो शिकवा कैसा, जो मेरा था ही नहीं, वो रुका नहीं। बस इतनी सी ख़्वाहिश है तुमसे, मुझे फिर से वही बना दो— जो कभी था, जब दर्द सिला नहीं। एक उम्र गुज़री तेरा नाम लेते, चंद लम्हे बस तेरे साथ जी लूँ। खुश रहो, हर खुशी तेरी हो, मैं दूर से ही, तेरी परछाई सा चलूँ।

जा रही हो…?

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जा रही हो… प्यास को ठुकराकर, नदी! ये दुनिया तुझे क्या कहेगी? किनारे चुप हैं, जल की ख्वाहिश में, धूप की चादर ओढ़े खड़े हैं पेड़। बहते थे संग तेरे जो गीत बनकर, आज वही लब सिले-सिले से हैं। प्यार की मिट्टी दरक गई है, पत्थर बचे हैं, आँखें पथराई हैं। फूल खिले थे कभी तेरी गोद में, आज शाखें सूनी सवाल करती हैं। उपवन सूखा, उम्मीदें पिघलीं, तू फिर भी जा रही है…