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Showing posts from November, 2017

एक ज़िद

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एक ज़िद कॉफी पीने की, एक ज़िद अपने वरिष्ठों के संग जीने की, एक ज़िद बचे चंद लम्हों को यादगार बनाने की, एक ज़िद हर मीठी चुस्कियों के बाद बकबकाने की, एक ज़िद हर 'बकबक' से कुछ सीख जाने की, एक ज़िद बचे चन्द लम्हों में खो जाने की, एक ज़िद अपनों के संग कॉफी पीने की ।।           ©अबोध, अपरिपक्व

धधकती प्रेम कथा

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#धधकती_प्रेम_कथा इस कहानी का मुख्य किरदार है चंदर जिसकी परवरिश इलाहाबाद के शुक्ला जी के घर में होती है जो शिक्षा विभाग में बड़े अधिकारी हैं। उनकी एक लड़की है सुधा। चंदर और सुधा में एक अनकहा प्रेम है। शुक्ला जी के चंदर के ऊपर बहुत अहसान हैं। एक दिन शुक्ला जी चंदर को बुलाते हैं और उसे अपनी नई किताब के बारे में बतलाते हैं। किताब में भारत की जाति व्यवस्था की शायद पुरज़ोर पैरवी की गई है, चंदर और सुधा की जाति एक नहीं है, इसलिए शायद चन्दर अपना कदम पीछे खींच लेता है।  लेकिन इसमें सुधा और चंदर का मिलन ना होने के पीछे उनका विजातीय होना भी बिलकुल नहीं लगता...बल्कि सुधा,चंदर को अहसास ही नहीं हुआ कि उनके बीच कुछ कोमल भावनाएं पनप रही हैं...और जब अहसास हुआ तब देर हो चुकी थी...एक दूसरे पर अटूट विश्वास...एक दूसरे के बगैर जीना व्यर्थ लगे..ये सारे अहसास थे पर इसका नाम प्यार है....यह सुधा का दिल मानने को तैयार नहीं था...एक बार सुधा शायद रोती हुई कहती भी है.."उसने ये क्यूँ कहा कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ...मैं ना जाने तुम्हे क्या करती हूँ".... इस कहानी में प्लेटोनिक लव का कवर चढ़ाया गया है जि...