जा रही हो…?

जा रही हो… प्यास को ठुकराकर,

नदी! ये दुनिया तुझे क्या कहेगी?

किनारे चुप हैं, जल की ख्वाहिश में,

धूप की चादर ओढ़े खड़े हैं पेड़।

बहते थे संग तेरे जो गीत बनकर,

आज वही लब सिले-सिले से हैं।

प्यार की मिट्टी दरक गई है,

पत्थर बचे हैं, आँखें पथराई हैं।

फूल खिले थे कभी तेरी गोद में,

आज शाखें सूनी सवाल करती हैं।

उपवन सूखा, उम्मीदें पिघलीं,

तू फिर भी जा रही है…



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