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आज जाने की ज़िद ना करो....

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डियर रुथलेस... जा रही हो तुम...ऐसा लग रहा है जैसे कुछ छूट रहा है. जैसे हाथ से रेत फिसल रही हो. जानता था कि तुम एक दिन चली जाओगी, पर तुम्हे स्कूटी से जाते हुए देखकर लगा कि सच में तुम चली गई. एक बार भी मुड़कर नहीं देखी. ऊपर मैं तुम्हें एकटक देखता रहा. जब तक आंखों से ओझल नहीं हो गई तब तक.  अब कभी भी तुम्हारे दरवाजे के सामने मंडराता नज़र नहीं आऊँगा. अब कभी भी तेज आवाज में गाने नहीं बजाऊंगा. अब कभी भी दरवाजा नहीं खटखटाऊंगा. खिड़कियों से भी तुम्हें नहीं झांक पाऊंगा. तुम अब नज़र नहीं आओगी.  अब तुमसे कोई भी ज़िद नहीं कर पाऊंगा. तुम्हारी स्कूटी के पीछे बैठकर भोपाल भी नहीं घूम पाऊंगा. फिर कोई पुलिस वाला चालान नहीं काट पाएगा. सीसीडी में कोई इंट्रोवर्ट अब तुम्हें नहीं पकाएगा. ऑफिस से आते ही जो नजर तुम्हें ढूंढती थी, अब उस नजर को तुम कभी नहीं दिखोगी.  सच कहूं तो अब भोपाल पहले जैसा नहीं दिखेगा मुझे. भोपाल बोर करता है लेकिन अब और करेगा. काटेगा मुझे. पता है तुम्हें...अपने कमरे में तुम्हारा इंतजार मैं सुबह से ही कर रहा था. एक बार भी नहीं आई. चाहता था कि जोर से तुम्हें हग करूं लेकिन सच में...