Posts

मुझसे दूर रहो

नहीं रहा जाता  मैं ख़ुद दूर चली जाऊँगी  मैं पास आ जाऊँगा मैं आँखें बंद कर लूँगी मेरी आहट आएगी मैं छुप जाऊँगी तुम्हारी ख़ुशबू से ढूँढ लूँगा  तुम्हें भगा दूँगी कहाँ कहाँ से?  हर जगह से दिल से निकाल पाओगी?  हाँ हर जगह से !  होठों से, बालों से या फिर ख़यालों से?  हर जगह से… उन रातों से भी? उन बातों से भी ? हाँ!  रात के 3 बजे हैं, अभी भी मुझसे बातें कर रही हो!  हाँ तो क्या हुआ?  जाओ सो जाओ…कल ऑफिस है मेरा!  अच्छा सुनो! मुझसे दूर रहो…

आज जाने की ज़िद ना करो....

Image
डियर रुथलेस... जा रही हो तुम...ऐसा लग रहा है जैसे कुछ छूट रहा है. जैसे हाथ से रेत फिसल रही हो. जानता था कि तुम एक दिन चली जाओगी, पर तुम्हे स्कूटी से जाते हुए देखकर लगा कि सच में तुम चली गई. एक बार भी मुड़कर नहीं देखी. ऊपर मैं तुम्हें एकटक देखता रहा. जब तक आंखों से ओझल नहीं हो गई तब तक.  अब कभी भी तुम्हारे दरवाजे के सामने मंडराता नज़र नहीं आऊँगा. अब कभी भी तेज आवाज में गाने नहीं बजाऊंगा. अब कभी भी दरवाजा नहीं खटखटाऊंगा. खिड़कियों से भी तुम्हें नहीं झांक पाऊंगा. तुम अब नज़र नहीं आओगी.  अब तुमसे कोई भी ज़िद नहीं कर पाऊंगा. तुम्हारी स्कूटी के पीछे बैठकर भोपाल भी नहीं घूम पाऊंगा. फिर कोई पुलिस वाला चालान नहीं काट पाएगा. सीसीडी में कोई इंट्रोवर्ट अब तुम्हें नहीं पकाएगा. ऑफिस से आते ही जो नजर तुम्हें ढूंढती थी, अब उस नजर को तुम कभी नहीं दिखोगी.  सच कहूं तो अब भोपाल पहले जैसा नहीं दिखेगा मुझे. भोपाल बोर करता है लेकिन अब और करेगा. काटेगा मुझे. पता है तुम्हें...अपने कमरे में तुम्हारा इंतजार मैं सुबह से ही कर रहा था. एक बार भी नहीं आई. चाहता था कि जोर से तुम्हें हग करूं लेकिन सच में...

थोड़ा जल्दी आना था

Image
सुनो...तुम थोड़ा जल्दी नहीं आ सकती थी मेरी जिंदगी में? देखो कितना अकेला था मैं! पहले मिली होती तो, साथ में वक्त और जिंदगी दोनों बर्बाद कर रहे होते...

मैंने कब कहा तुमसे?

Image
मैंने कब कहा तुमसे कि नजदीकियां बढ़ाओ कब कहा कि मेरे करीब आओ.... या कब कहा कि मुझे तुम्हारी कमी है? जानती हो?  ज्यादा नजदीकियां रिश्तों में ऊबन लाती हैं और मैं नहीं चाहता कि ऊबन से रिश्तों में गांठ पड़े इसलिए तो तुम्हें मैं किसी बंधन में नहीं रखना चाहता तुम हमेशा खुली हवा में उड़ो, अपनी पहचान के साथ सुनो...कभी तुम्हें ऐसा लगा क्या कि हम दूर हो रहे हैं मैंने कभी ऐसा लगने तो नहीं दिया, नहीं न?  जब भी तुमने मुझे पुकारा मुझे एहसास हुआ कि एक रुहानी रिश्ता मुझे बुला रहा है... जब तुम मुझसे थोड़ी सी भी दूर होती हो मैं तुम्हें उतना ही अपने करीब महसूस करने लगता हूं जानती हो क्यों? क्योंकि थोड़ी दूरी हमेशा हमें पास लाती है यही मोहब्बत भरा फासला मैं तुम्हें देना चाहता हूं सुनो.. तुम्हें मैं अब खुद से भी ज्यादा चाहने लगा हूं अब तो खोने का डर भी सताता रहता है लेकिन मुझे पता है कि चाहे जितनी भी दूरी क्यों न हो हम एक दूसरे के दिल में उतने ही करीब हैं

पर थोड़ी सी बाकी हो...

Image
तुम चली गई हो  पर थोड़ी सी बाकी हो जितना बारिश के बाद  कुछ देर के लिए फुहार जितना फूल तोड़ने के बाद हाथों में भीनी-भीनी महक मंदिर में घंटियां बजाने के बाद धीरे-धीरे आवाजों की पुनरावृत्ति जितना शहर छोड़ने के बाद  रह जाती है धुंधली सी याद जितना मकान छोड़ने के बाद रह जाता है अपनेपन का एहसास सच में, तुम चली गई हो पर थोड़ी सी बाकी हो जितना जाने से पहले होता है  अंतिम छुअन का एहसास!                                                                                               ---Shivam

और अंत में सारा प्रेम मर जाता है

Image
और अंत में एक दिन हमारे अंदर का सारा प्रेम मर जाता है, हमारे पास किसी नए को प्यार करने का कारण नहीं रह जाता, हम बस दुःख में जीते रह जाते हैं और फिर से प्रेम करना नहीं सीख पाते, एक बीती शाम के लिए न जाने कितने सुबहों का हम बलिदान कर देते हैं!

दिल्ली में घर नहीं होता!

Image
 दिल्ली में घर नहीं होता! दिल्ली में घर नहीं होता, यहां सिर्फ आरामगाह होता है. शाम 7 बजे से लेकर, सुबह के 7 बजे तक  सिर्फ आराम करने आते हैं, यहां गांव का आंगन नहीं होता, न नीम के पेड़ होते हैं और न ही चारपाई होती है यहां सिर्फ 1 BHK का एक डेरा होता है! यहां खेत खलिहान नहीं होते, यहां आम का बाग नहीं होता, यहां सरसों के पीले खेत नहीं  हवाओं में माटी की खुशबू नहीं, यहाँ सिर्फ धूल-धुएं का गुबार है. यहां घर होता है, दफ्तर और मेट्रो जिसमें हम सपनों का पीछा करते हैं यहां घर वाला कोई सुकून नहीं होता हां, दिल्ली में कोई घर नहीं होता, सिर्फ आरामगाह होता है!