दिल्ली में घर नहीं होता!
दिल्ली में घर नहीं होता!
दिल्ली में घर नहीं होता,
यहां सिर्फ आरामगाह होता है.
शाम 7 बजे से लेकर,
सुबह के 7 बजे तक
सिर्फ आराम करने आते हैं,
यहां गांव का आंगन नहीं होता,
न नीम के पेड़ होते हैं
और न ही चारपाई होती है
यहां सिर्फ 1 BHK का
एक डेरा होता है!
यहां खेत खलिहान नहीं होते,
यहां आम का बाग नहीं होता,
यहां सरसों के पीले खेत नहीं
हवाओं में माटी की खुशबू नहीं,
यहाँ सिर्फ धूल-धुएं का गुबार है.
यहां घर होता है, दफ्तर और मेट्रो
जिसमें हम सपनों का पीछा करते हैं
यहां घर वाला कोई सुकून नहीं होता
हां, दिल्ली में कोई घर नहीं होता,
सिर्फ आरामगाह होता है!

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