माँ से शिकायतें...

शिकायतें...

माँ को गए 20 साल से ज्यादा हो रहे हैं. सभी की तो कुछ न कुछ यादें होती हैं अपनी माँ से जुड़ी, लेकिन मुझे तो कुछ याद भी नहीं कि कैसी थीं वो? सभी लोग सपने में भी अपनी मां को देख लेते हैं लेकिन मैं तो सपने में भी नहीं देख सकता, क्योंकि उनका चेहरा मुझे याद ही नहीं है. मेरे पास सिर्फ दो फ़ोटो है उनकी, जब कभी कमी महसूस होती है, एक नजर देख लेता हूँ.

बहुत शिकायत है माँ तुमसे क्योंकि तुम्हें इस तरह से मुझसे दूर नहीं जाना था.
सबकी एक आदत होती है, माँ, मम्मी कहने की, माँ-माँ की रट लगाने की, मैं आज तक इन शब्दों को कह नहीं पाया या यूं कहें कि मैं इन शब्दों को जी नहीं सका. बहुत मन होता है कि जोर से चिल्लाऊं 'माँ' कहकर लेकिन नहीं कह पाता...आदत नहीं है न! और तुम सुनती भी तो नहीं!

बचपन में देखता था कि मेरे उम्र के बच्चे कुछ गलती करके या किसी से डरकर भागते हुए अपनी माँ की आँचल में छुप जाते थे...मैं कभी इस तरह न छुप सका...बहुत मन होता था कि सीने से लगकर छुप जाऊँ और सारा डर भूल जाऊँ लेकिन ये भी नसीब न हो सका.

सभी होली दीवाली पर घर जाते हैं...मेरा भी मन होता है पर मैं नहीं जा पाता, कैसे जाऊँ वहाँ तुम नहीं रहती न? न जाने कितनी शिकायतें हैं लेकिन मैं तुमसे कह भी नहीं पाता क्योंकि तुम मेरा कहा सुनती कहाँ हो!

आज बहुत मन हो रहा है कि सबकी तरह मैं भी कभी तुम्हारे साथ एक सेल्फी शेयर करूँ लेकिन तुम इतनी दूर चली गयी हो कि तुमसे कुछ कह भी नहीं सकता.

अब नहीं लिखूंगा...मुबारक हो तुमको ये दिन...जहाँ हो वहीं से आशीर्वाद बनाए रखना.

 

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