माँ के मरते ही.....
माँ के मरते ही पिता को बदलते देखा है,
एक ही छत के नीचे संतानों में भेद होते देखा है।
माँ बाप के सौतेलेपन से खुद को बिलखते देखा है,
क्या कहूँ बिन माँ के खुद को हर दिन तरसते देखा है।
घर होते हुए भी खुद को खानाबदोश होते देखा है,
अपनो के होते हुए हर ख्वाहिशों को मरते देखा है।
हक़ होते हुए भी खुद को टुकड़ो पर पलते देखा है,
हाँ माँ के मरते ही पिता को बदलते देखा है।
एक 'माँ' की यातना में बचपन पलते देखा है,
पिता के चुप्पी पर खुद को उजड़ते देखा है।
मासूम बचपना में दर-दर भटककर देखा है,
घर होते हुए भी खुद को बेघर होते देखा है।
लड़कपन के दिन में मेहनत करके देखा है,
खुद पालकर शहर में बढ़ते हुए देखा है।
इस शहर में अपनो को पराया होते देखा है,
परायों को अपनों में बदलते हुए देखा है।
हाँ माँ के मरते ही पिता को बदलते देखा है।
© सच की साधना से
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