क्या जरूरत है?

क्या जरूरत है तुम्हे इतना मुस्कुराने की?
एक तो इतनी हँसी हो ऊपर से शरमाने की।

क्या जरूरत है तुम्हें एकतरफ़ा जुल्फ़े गिराने की?
एक तो उलझी हैं ऊपर से सुलझाने की।

क्या जरूरत है तुम्हें होठों की लाली बढ़ाने की?
एक तो गुलाब की पंखुड़ी सी हैं ऊपर से कहर बरपाने की!

क्या जरूरत है तुम्हे इतना इत्र लगाने की?
एक तो इतना महकती हो ऊपर से मुझे भी महकाने की!

क्या जरूरत है तुम्हें इतना काज़ल लगाने की?
एक तो शीशे सी आँखें हैं, ऊपर से कातिल बनाने की।

क्या जरूरत है तुम्हे दुपट्टे का कोना फ़साँने की?
एक तो संभलती नही ऊपर से गिरवाने की।

क्या जरूरत है तुम्हें इतना नजरें मिलाने की?
एक तो आँखें बन्द होती नहीं ऊपर से नींदे उड़ाने की।

क्या जरूरत है तुम्हें और पास बुलाने की?
एक तो इतने करीब हैं हम, ऊपर से दो जिस्म 'एक जान' हो जाने की।

क्या जरूरत है मुझे इतना मनाने की?
एक तो बिछा पड़ा हूँ मैं, ऊपर से इश्क-ए-बिछौना बिछाने की।

क्या जरूरत है इतना पिघलाने की?
एक तो पिघल रहा हूँ ऊपर से मुझे बहाने की।

क्या जरूरत है इतना सब कुछ जताने की?
एक तो खुली किताब हो तुम, ऊपर से बतलाने की।

© शिवम चौहान

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