बेदखली!

मुँह में जुबां नही फिर भी कोहराम मचाते हो,
जो वजह 'था' उसे बेवजह ही घसीट लाते हो,
खूब हुनर है ज़नाब मर्ज-ए-शक में मरे जाने की,
अरे हमने जिसे अपनी चेतना से बेदखल किया,
उसे बेवजह ही मेरे मन के घरौंदे में लेकर आते हो।।

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