तू खुश रह!

जा, कर दिया बेदख़ल तुझे अपनी चेतना से,
गर यकीं न हो तो पूछ लेना अपनी वेदना से।
नही आऊँगा कभी तेरी राह-ए-ज़िंदगी मे,
वो ज़िन्दगी ही मैंने मार डाली तेरी हर बंदगी में।
जो नजरें  मिल  जाते थे  कभी  गफ़लत में,
वे नज़र भी हमने फोड़ डाले तेरी फ़रेब उल्फ़त में।
तुझको  छू  कर  जो हवा मुझ तक आती  है,
अब वो हवा भी कमबख्त़ ग़ुनाह सी लगती है।
चन्द लम्हों की खतायें सालते रहेंगे ज़िन्दगी भर,
जा खुश रह तू ,ये दुआ है मेरी आसमाँ भर, ज़मीं भर!!

शिवम!

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