जख्मी दिल!
जख़्म देते हो तो दो मरहम लगा दिया करो,
ख़ामोश लब हैं मग़र शिकायतें तो किया करो।
क्या हुआ जो दुआ में याद नही हैं हम...
दुश्मन समझकर बद्दुआ ही दिया करो।
यूँ तो तेरे महफ़िल में आने के क़ाबिल नही हम,
किसी और के महफ़िल में ही शामिल किया करो।
ऐ ज़ालिम! इश्क़ तो करती नही तू अब,
जी भर के नफऱत ही कर लिया करो।।
शिवम
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