दुष्यंत जी!
आज के ही दिन दुष्यंत कुमार अवतरित हुए थे, मात्र 42 साल की अल्पायु में राजनीति, समाज व प्रेम पर बड़ी बेबाकी से हिन्दी ग़जल, कविता, उपन्यास लिखकर अमर हो गए। उनकी ग़जलों के यूँ तो सभी कायल होते थे पर उस दौर के दिग्गज भी उनकी वाहवाही करने से नही थकते थे, वे अधिकतर ग़ज़लें अपनी ज़िंदगी के अंतिम समय मे लिखे थे कहते हैं दीपक की लौ अंत मे ही तेज होकर बुझती है, लेकिन ये लौ है कि आज भी जल रही है। गर्व की बात ये है कि वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूरा छात्र रहे हैं और वे जो साहित्य का दीपक जलाये थे आज भी जल रही है, अनवरत जलती रहेगी।
आज 'साये में धूप' की कुछ पंक्तियों को पढ़ा, वास्तव में "साये में धूप" जैसी किताब लिखना किसी भी रचनाकार का सुनेहरा स्वप्न हो सकता है...ऐसी नायाब ग़ज़लें हैं इस संकलन में की जितनी बार पढो हर बार अलग ही आनंद आता है...दुष्यंत जी जैसे रचनाकार पैदा नहीं होते...अवतरित होते हैं।
'साये में धूप' की कुछ पंक्तियाँ!
कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहाँ दरख़तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए
न हो कमीज़ तो पाँओं से पेट ढँक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए
वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए
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