आम वाले दिन!
गरमी आती है तो छुट्टियां लाती है और साथ में हम सबका पसंदीदा फल आम भी। आम ही एकलौता फल है जिसे हर वर्ग के लोग पसंद करते हैं, मने खाने में कोई आनाकानी नही भले खाने के लिए लड़ाई तक हो जाती है, करें भी क्यों न ये जो फलों का राजा है आखिर।
मेरे ज़िन्दगी का सबसे हसीन पल यानी मेरा बचपन मेरी नानी के यहाँ ही गुजरा।
मैं और मेरी बड़ी बहन हम दोनों नानी के यहाँ ही अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी किए थे।
मुझे आज भी याद है जब गर्मियों की छुट्टियां होती थी तो अधिकतर समय हम भाई बहन और पड़ोस के अन्य बच्चे नानी के बाग में ही जमवाड़ा लगाते थे।
मेरी नानी के यहां आम के नौ पेंड़ थे जिन्हें मेरे स्वर्गवासी नाना जी लगाए थे, जिसमे से अब सिर्फ 4-5 बचे होंगे बाकी आंधी में गिर गए।
बाग नानी के घर से थोड़ी दूरी पर था , मेरे और मेरी दीदी में एक जंग सी होती थी कि कौन सबसे पहले जाएगा बगीचा? कौन सबसे ज्यादा आम बिनकर लाएगा? कौन ललचाकर खायेगा?
मैं अक्सर हार जाता था ये जंग क्योंकि दिन भर का खेला कूदा देर तक सोता था जब तक नानी की पतली छड़ी मेरे पीछे नही बजती।
खैर जब आंखे खोलता था बाग के तरफ आंख मिजते दौड़ लगाने लगता लेकिन पहुँचते ही दीदी सारा आम साफ कर देती और खूब चिढ़ाती थी और मैं अपना सा मुँह बना लेता था।
मतलब आम न हो गया पानीपत का जंग!
ख़ैर आम घर आते ही दीदी बिना मेरे नही खाती थी, भले ही कुछ देर तक आम दिखा-दिखा कर मुझे ललचाती रहती, मैं भी अगर पाता था तो उन्हें जरूर देता था भले ही आम बिनने में कितना भी झगड़ा क्यूँ न हो जाये! लेकिन खाते वक़्त बिल्कुल भी नही।
मुझे आज भी याद है जब आंधी आती और अगर मैं आम पा लेता था तो जल्दी से उसे मुँह में लगाकर जूठा कर देता था ताकि कोई और न मुझसे छीन पाए, मेरी बहन मेरा जूठा नही खाती थी वो हमेशा कहती थी कि ये ब्रश नही करता मैं इसका जूठा नही खाने वाली।
आम बिनने के लिए न आंधी देखते थे न लू देखते थे न बरसात...बस आंखों में पके आम नजर आते थे और कुछ नही।
मने जो मजा और स्वाद खुद से आम पाकर खाने में होती थी वो दूसरे के दिये हुवे में कहाँ!
मतलब आकर्षण फल फूल और दौड़ भाग का ही होता है।
आम के बाग में कोयल कूकती रहती और हम भाई बहन उसी आवाज में दुहराते दुहराते उसे जबरन बोलवाने का प्रयास करते। तोते आम जूठा कर देते और जूठे आम हम दोनों नानी को दे देते...और नानी उसे धोकर खा लेती।
उस जमाने मे तो कभी कभी मोर भी दिख जाया करते थे।
हम दोनों भाई बहन उनसे ईर्ष्या करते थे जो आम के पेड़ के नीचे खटिया डाल कर अगोरते थे या आम के बागों का अकेले ठेका ले लेते थे और पूरा मौसम हठी बनकर वहीं बीता देते थे।आम तो सबके लिए होना चाहिए इसमें बंदिशें कहाँ से आ जाती हैं?
मने आम ऐसा फल होता है कि घर के सभी लोगों को इकठ्ठा कर देता था। देसी आमों का जलवा तो गांवों में ही देखने को मिलता है आम को ठंडा करने के लिए बाल्टी में पानी आता। पानी कुओं का होता था अब तो बस कुओं की यादें भर बची हैं, अब गांव जाता हूँ तो कुएँ सूख गए हैं और गढ्ढे में बदल गए हैं।
नानी के यहाँ आम सच मे आम होता था मतलब पेड़ का पका आम जिसकी मिठास की अनुभूति खाने वाला ही जनता था।
आम के सच्चे दीवाने जो होते हैं वो पेड़ों पर पके आम ही खाते हैं अब तो रसायन से आम पकाना परम्परा होता जा रहा है।
आम की यादें सिर्फ उसे खाने तक सीमित नही है हम आम के पेड़ों के नीचे दिन भर खेलते थे, आम के गुठलियों से बाजा बजाते थे।
गांवों में गर्मियों के दिन को आम का दिन कहा जाता है, मने आम से आमरस, चटनी पुदीने वाली, खटाई, अचार, अमचूर, अमावट और आम का पना ....यह सब आम के दिनों की ही देन होती है।
हां अब आम के दिनों की याद आती है , उन फलों से लदे बागों को देखने के लिए आँखें तरसती हैं, पेड़ों पर तोतों का जमावड़ा, गिलहरियों की फुर्र फुर्र भागना याद आता है, कोयल की कूक याद आती है...हाँ आम के दिनों की बचपना याद आती है।
ये कहानी मेरे बचपन के दिनों की है।
©शिवम
Photo source: Google

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