तुम्हे याद तो है न ?





तुम्हें याद तो होगा न,

सड़कें, सफ़र, दरख़्त और बातें

हमेशा साथ देने की कसमें, वादे

मेरे जेब में पड़ी आखिरी सिगरेट, 

और तुम्हारा मना करना,

सर्द, सुनसान रातों में

कोहरे के बीच रहस्यमयी राहों में 

फुटपाथ पे पड़े पत्थर के टुकड़े

ठोकरों से उछालना,

और तुझसे बातें करते करते

कहीं दूर निकल जाना,

और भोर में लौटकर आना,

और जल्दी से जागकर...तुझे भी जगाना,

हाँ तेरे लिए बस फर्स्ट पीरियड अटेंड करना,

तेरे ही लिए सारे नोट्स तैयार करना,

तेरे दुपट्टे के रेशमी डोरों को...

यूँ ही बेवजह छू कर निकल जाना,

बात बात में तेरा यूँ धीरे से मार देना,

हरवक्त एकदूसरे को बेचैन होकर खोजना,

आंखों से आंखें मिलते ही तेरा मुस्कुरा जाना,

परेशान होते ही तुम्हारा मेरे पास आना।


याद है न?


तेरे बालों का उड़-उड़ के

मेरे गालों तक छू जाना।

चलती क्लास में सीट खींचते रहना, 

और मेरा नखरे दिखाना,

कभी तेरा नखरे दिखाना,
तेरे मेरे बदमाशियों से टीचर का नाक फूलना
याद तो है न?

तुम्हें याद तो होगा न,

तुम्हारा तब तक इन्तेज़ार करना

जब तक तेरा मुस्कुराता चेहरा न दिखे,



बीते फरवरी वाली रात,

और वो जाड़ों वाली बात,

अब ये तपती गर्मी में तपना,

और तेरी इंतेजार में जलते रहना।

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