एक सफर हो....जिसमें केवल 'हम' हों!
एक सफर तुम्हारे साथ हो , उसमे केवल 'हम' हों। बहुत दूर ऐसे शहर में जहां मेरे साथ तुम हो, हांथो में तेरा हाथ हो, हर कदम तेरा साथ हो।
इलाहाबाद की उदास गलियों, मुहल्लों में बस तुम्हारी उन्मुक्त हंसी हो, इन्ही हंसी लम्हो के बीच तुम्हारी चहलक़दमी हो, मैं बस तुम्हें निहारे जाऊँ और तुम शरमा कर नज़रें चुराती जाओ। इलाहाबाद के अनकहे तमाम पहलुओं को समेटे एक किताब हो और उस किताब के हर एक पन्ने पर सफ़र के ठिकानों का ज़िक्र हो- संगम घाट, सरस्वती घाट, यमुना पुल,वोट क्लब, मिंटो पार्क, शिव चाट व तमाम इश्कियाना पगडंडियों का ज़िक्र हो।
एक सफर हो तुम्हारे साथ तुम्हारे घर के दरवाजे तक, हमारे घर की चौखट से मिलों दूर, तुम्हारी गलियों तक। इलाहाबाद की पूरी भीड़ को समेटे हमारी एक तस्वीर हो, कोचिंग के बाहर हर चाय टपरी पर लिखे इश्क़ का ज़िक्र।
एक सफर हो मेरे दिल के खिड़की से तुम्हारे दिल की खिड़की तक।
इलाहाबाद को समेटे संगम की अविरल धारा में हमारे प्रेम की पवित्रता का ज़िक्र हो। यूनिवर्सिटी की सड़कों पर लिखे हमारे इश्क़ का ज़िक्र।
एक सफ़र हो....तुम्हारे दिल के दरवाजे से वापस मेरे दिल के चौखट तक.... जहाँ तुम्हारा साथ हो हम थककर पूरी ज़िंदगी एक दूसरे की बाहों में हमेशा के लिए सो जाएं...जहाँ जगाने कोई न आए।
एक सफर हो जहाँ 'हम' हों और कोई न हो।

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