तेरी आवाज की तलब

ये चांदनी सी रात की बात है,
जब आसमां पर चाँद धुंधला सा निकला था,
उस वक़्त मैं किताबी दुनिया मे खोया था,
नींद की झपकियां आ जा रही थीं,
तभी फिसलकर तेरी इनबॉक्स में जा गिरा,
इनबॉक्स के सिरहाने एक डिब्बे में तेरी मादक आवाज थी,
उस डिब्बे की चुल्लू भर आवाज से रात भर नहाया था,
खूब धूला था अपने मन मंदिर को
जिसमे तुम रहा करती हो,
और आज भी जब खुद को धुलना होता है,
नहा लेता हूँ 'उस' चुल्लू भर आवाज से,
जिससे मेरे मन की नदी बहने लगती है,
हाँ तुम्हारी आवाज सुकून की ग्लेशियर है,
और आज इस ग्लेशियर को पिघला दो, मुझे आवाज दो।
तलब है इसकी।
मेरा डिब्बा खाली है, भर दो न इसे अपनी आवाज से।
देखो जल्दी से मेरा डिब्बा भर देना,
क्योंकि तलब हो या व्यसन ......
बढ़ता जाता है...बढ़ता जाता है....!

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