धधकती प्रेम कथा

#धधकती_प्रेम_कथा

इस कहानी का मुख्य किरदार है चंदर जिसकी परवरिश इलाहाबाद के शुक्ला जी के घर में होती है जो शिक्षा विभाग में बड़े अधिकारी हैं। उनकी एक लड़की है सुधा। चंदर और सुधा में एक अनकहा प्रेम है। शुक्ला जी के चंदर के ऊपर बहुत अहसान हैं। एक दिन शुक्ला जी चंदर को बुलाते हैं और उसे अपनी नई किताब के बारे में बतलाते हैं। किताब में भारत की जाति व्यवस्था की शायद पुरज़ोर पैरवी की गई है, चंदर और सुधा की जाति एक नहीं है, इसलिए शायद चन्दर अपना कदम पीछे खींच लेता है।
 लेकिन इसमें सुधा और चंदर का मिलन ना होने के पीछे उनका विजातीय होना भी बिलकुल नहीं लगता...बल्कि सुधा,चंदर को अहसास ही नहीं हुआ कि उनके बीच कुछ कोमल भावनाएं पनप रही हैं...और जब अहसास हुआ तब देर हो चुकी थी...एक दूसरे पर अटूट विश्वास...एक दूसरे के बगैर जीना व्यर्थ लगे..ये सारे अहसास थे पर इसका नाम प्यार है....यह सुधा का दिल मानने को तैयार नहीं था...एक बार सुधा शायद रोती हुई कहती भी है.."उसने ये क्यूँ कहा कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ...मैं ना जाने तुम्हे क्या करती हूँ"....

इस कहानी में प्लेटोनिक लव का कवर चढ़ाया गया है जिसमें दैहिक संबंध के बिना अपने प्रेम का चरम रूप दो प्रेमी दिखाना चाहते हैं। और इस प्लाटोनिक लव के नाम पर नायक का खुद को देवता समझ लेना उसे अंत आते-आते तक गुनाहों का देवता बना देता है।

धर्मवीर भारती ने इन सारे अहसासों को बहुत अच्छी तरह उकेरा है। उन्होंने कहानी को  इतना मर्मस्पर्शी भावों में व्यक्त किया है जैसे लगता है कि वो खुद उसके पात्र हों।

आजकल के युवाओं खासकर स्त्रियों को सुधा से प्रेरणा लेनी चाहिए ,जिसने अपने जीवन में सच्चे प्रेम का एक महान उदाहरण प्रस्तुत किया है!
ये पुस्तक मेरे मन मन्दिर में हमेशा बसी रहेगी और मेरे ह्रदय की कोमल भावनाओं को सदैव जीवित रखेगी,मैं सभी लोगों से आग्रह करूंगा की इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें अगर आप प्रेम को सच्चे अर्थों में समझना चाहते हैं!

Comments

Popular posts from this blog

Our Last meeting!

आज जाने की ज़िद ना करो....

माँ से शिकायतें...