पुरस्कार का तिरस्कार




असल में पुरस्कार किसी कलाकार, खिलाड़ी या किसी व्यक्तित्व को नही मिलता , पुरस्कार तो खुद ऐसे लोगों के पास जाकर खुद पुरस्कृत होता है।
आज हमारे देश में पुरस्कारों को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है ,आज हर पार्टी अपने लोगों या कहें कि अपने चाटुकारों को पुरस्कार दे रही है तो कोई सन्देह नही होगा। और सत्ता में आते ही पार्टी में हलचल होने लगती है कि किसको पुरस्कृत करना है किसको नही। क्या पुरस्कार देने का यही मापदण्ड है ? पुरस्कार का कितना तिरस्कार हो रहा है कि जिसको वो शोभा देता है उसके पास नही है। पुरस्कार कोई सरकार की एहसान नही होती वो तो उस स्तर के बौद्धिक लोगों का सम्मान होता है जिसके वो असल मे हक़दार होते हैं।
अगर हम कांग्रेस की बात करें तो सभी जानते हैं कि अधिकतर पुरस्कारों के नाम तक वो अपनी पार्टी के लोंगो के नाम पर रखी है। क्या हमारे देश में केवल नेहरू व गांधी परिवार के ही महान व्यक्तित्व हैं और कोई नही है? मेरा कोई अपमान करने का उद्देश्य नही है लेकिन हम चाहते हैं कि भारत के सभी स्वतंत्रता सेनानियों के साथ समान भाव से बर्ताव हो, उन्हें भी सम्मान का अधिकार है , ये बताने के लिए जरूरी नही है कि ये देश के लिए क्या किये?
हमारे देश में वोटबैंक के मद्देनजर ऐसे लोगों का चयन किया जाता है जिससे कि उन्हें आगामी चुनावों में लाभ मिले।

पुरस्कार वापसी गैंग का पर्दा तब उठ गया जब वे कांग्रेस के अनुकूल राजनीतिक लाभ के माहौल में ही पुरस्कारों की वापसी करते हैं। क्या इन्हें ऐसे ही मौकों पर पुरस्कार का तिरस्कार करने का अधिकार है , 2014 से पहले ये गैंग कहाँ थी? इससे कांग्रेस की अवैध पुरस्कार वितरण का पोल पूरी तरह बेनक़ाब हो गया। वे उन्ही लोगों को चुनती है जिससे उन्हें राजनीतिक लाभ मिल सके।

ख़ैर बीजेपी भी इस मामले में पीछे क्यों रहे उसका भी मानना था कि 60 वर्षों से हमारे लोगों को  कांग्रेस ने नज़रअंदाज़ किया है हम भी अपने लोगों का सम्मान करना जानते हैं और इसतरह से पुरस्कार का ये मानक हमारे भारत देश के राजनेताओं ने तय कर दिए और पुरस्कार का तिरस्कार जारी है , मौजूदा समय मे ऐसे बुद्धिजीवी बहुत कम ही हैं जिन्हें ईमानदारी से सरकार पुरस्कार दे रही हो।

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