यादों की बेशर्मी तो देखो!
आज दिन भर खामोशी छाई रही पता नही क्यों लेकिन मन कुछ बेचैन सा था, रात को सोने चला तो नींद भी नही आ रही थी, फिर मुझे एहसास हुआ कि आज फिर मैं तुम्हारी झिलमिल सी यादों में मर रहा हूँ रोज की तरह ही लेकिन आज कुछ ज्यादा।
पता है तुम कभी मेरी लिखी बातों को खुद में जगह देती थी आज लड़ जाती हो क्योंकि आज तुम्हे इन बातों से तबाह होने का डर सताता रहता है, आज मेरी परवाह खत्म हो गयी है आज कहीं और रहती हो। मेरी जरूरत खत्म हो गयी है शायद इसीबात से तुम्हे मेरी बातें बेहद फूहड़ लगती है।
हां मैंने भी बहुत गलतियां की लेकिन तुमने मुझे कोई मौका ही कहाँ दिया उसे सही करने का?
आज मैं सब कुछ तुमसे सुलह कर लेना चाहता हूँ लेकिन तुम हो कि और बिगाड़ देने में अपनी जीत समझती हो।
बहुत दिन हो गए कोई शिकायत किये तुमसे और कुछ मांगे तुमसे आज कुछ शिकायत लिखने बैठा हूँ और कुछ मांगने भी , लेकिन पता है कि कोई फर्क नही पड़ने वाला, फिर भी बेशर्मी से लिख रहा हूँ।
आज 22 मई 2018 है और तूझसे अलग हुवे लगभग डेढ़ महीने हो रहे हैं।
ये डेढ़ महीना मेरी ज़िंदगी के सबसे बुरे दौर में से एक रहा है , ऐसा कब तक रहूँगा पता नही मुझे।
ये अंधेरे जैसा है एकदम घना अंधेरा जिसमें मैं दिन रात तुझसे बिछड़ते हुवे देखता रहता हूँ, हर पल मेरे लिए जीना दुश्वर होता जा रहा है।
जानती हो आजकल मैं बहुत कम सोता हूँ लेकिन जितना भी सोता हूँ बहुत डरावने सपने आते हैं, कभी कभी सपने में डरी हुई आवाज भी निकल जाती है, और सोते सोते एकाएक डर कर बैठ जाता हूँ और फिर पूरी रात बैठे बैठे ही गुजार देता हूँ।
आजकल घूमना फिरना बन्द कर दिया हूँ, अकेले रहने लगा हूँ, जब लगता है कि ये खामोशियाँ कहीं मार न दे मुझे तो तुम्हारा दिया हुआ F.R.I.E.N.D.S और अपना डाऊनलोड किया हुआ Mr. Bean देख लेता हूँ भले ही हँसी रच मात्र न आती हो और कुछ ही पल में बंद करके कुछ और करने लगूँ।
व्यस्त जबर्दस्ती नही रहा जा सकता , एक दिन मुझसे मेरी एक दोस्त ने कहा जितना व्यस्त रहोगे उतना मस्त रहोगे, मैंने ट्राय भी किया लेकिन ये फॉर्मूला मुझे नही जंचा।
आजकल आईने के सामने खड़े होकर घण्टो अपनी बगल में तुझे महसूस करता हूँ, तुझे देखता हूँ तेरी वो बच्चों सी आंखों में झाँकने की ज़िद करता हूँ , प्लीज एक बार मुझसे नजरें मिलाओ न, मुझे अपने पास बुलाओ न।
तुम्हारी मासूम सी हँसी कहाँ जाऊँ खोजने? तुम्हारी बातों की मिठास कहाँ से चुराऊं? तुम्हारे साथ खुलकर हँसे जैसे बरसों हो गए हों वो हँसी मैं फिर से जीना चाहता हूँ।
वो पुरानी ज़िन्दगी कहाँ से लाऊं जिसमे हम दोनों जीते थे?
वो प्यार, वो तक़रार, वो ज़िद, वो इन्तेज़ार, वो तेरी धीरे से थप्पड़ और मार , तेरे गुनगुनाने की धुन और नज़रों का वार!
कहाँ से लाऊं मैं तुझे? खुद को कैसे मनाऊं? कुछ तो बता दो?
तुम्हे पता है जो चोट खाता है वो किसी से कहकर जी लेता है लेकिन जो चोट देता है वो घुट घुट कर हर पल मरता रहता है, जैसे मैं इस वक़्त मर रहा हूँ लेकिन कहीं न कहीं तुम मुझे अकेले छोड़कर बड़ा गुनाह किया है मेरे साथ।
जब तुम्हे जरूरत थी तब मैं हमेशा हाथ थामे रहा लेकिन मेरे वक़्त पर तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया क्यों आखिर कहां मैंने कमी की थी? बता सकती हो? तो बताओ?
अब जिसने भी चोट दिया हो वो तो झेलेगा ही! चाहे हम हों या तुम!
पता है तुम कभी मेरी लिखी बातों को खुद में जगह देती थी आज लड़ जाती हो क्योंकि आज तुम्हे इन बातों से तबाह होने का डर सताता रहता है, आज मेरी परवाह खत्म हो गयी है आज कहीं और रहती हो। मेरी जरूरत खत्म हो गयी है शायद इसीबात से तुम्हे मेरी बातें बेहद फूहड़ लगती है।
हां मैंने भी बहुत गलतियां की लेकिन तुमने मुझे कोई मौका ही कहाँ दिया उसे सही करने का?
आज मैं सब कुछ तुमसे सुलह कर लेना चाहता हूँ लेकिन तुम हो कि और बिगाड़ देने में अपनी जीत समझती हो।
बहुत दिन हो गए कोई शिकायत किये तुमसे और कुछ मांगे तुमसे आज कुछ शिकायत लिखने बैठा हूँ और कुछ मांगने भी , लेकिन पता है कि कोई फर्क नही पड़ने वाला, फिर भी बेशर्मी से लिख रहा हूँ।
आज 22 मई 2018 है और तूझसे अलग हुवे लगभग डेढ़ महीने हो रहे हैं।
ये डेढ़ महीना मेरी ज़िंदगी के सबसे बुरे दौर में से एक रहा है , ऐसा कब तक रहूँगा पता नही मुझे।
ये अंधेरे जैसा है एकदम घना अंधेरा जिसमें मैं दिन रात तुझसे बिछड़ते हुवे देखता रहता हूँ, हर पल मेरे लिए जीना दुश्वर होता जा रहा है।
जानती हो आजकल मैं बहुत कम सोता हूँ लेकिन जितना भी सोता हूँ बहुत डरावने सपने आते हैं, कभी कभी सपने में डरी हुई आवाज भी निकल जाती है, और सोते सोते एकाएक डर कर बैठ जाता हूँ और फिर पूरी रात बैठे बैठे ही गुजार देता हूँ।
आजकल घूमना फिरना बन्द कर दिया हूँ, अकेले रहने लगा हूँ, जब लगता है कि ये खामोशियाँ कहीं मार न दे मुझे तो तुम्हारा दिया हुआ F.R.I.E.N.D.S और अपना डाऊनलोड किया हुआ Mr. Bean देख लेता हूँ भले ही हँसी रच मात्र न आती हो और कुछ ही पल में बंद करके कुछ और करने लगूँ।
व्यस्त जबर्दस्ती नही रहा जा सकता , एक दिन मुझसे मेरी एक दोस्त ने कहा जितना व्यस्त रहोगे उतना मस्त रहोगे, मैंने ट्राय भी किया लेकिन ये फॉर्मूला मुझे नही जंचा।
आजकल आईने के सामने खड़े होकर घण्टो अपनी बगल में तुझे महसूस करता हूँ, तुझे देखता हूँ तेरी वो बच्चों सी आंखों में झाँकने की ज़िद करता हूँ , प्लीज एक बार मुझसे नजरें मिलाओ न, मुझे अपने पास बुलाओ न।
तुम्हारी मासूम सी हँसी कहाँ जाऊँ खोजने? तुम्हारी बातों की मिठास कहाँ से चुराऊं? तुम्हारे साथ खुलकर हँसे जैसे बरसों हो गए हों वो हँसी मैं फिर से जीना चाहता हूँ।
वो पुरानी ज़िन्दगी कहाँ से लाऊं जिसमे हम दोनों जीते थे?
वो प्यार, वो तक़रार, वो ज़िद, वो इन्तेज़ार, वो तेरी धीरे से थप्पड़ और मार , तेरे गुनगुनाने की धुन और नज़रों का वार!
कहाँ से लाऊं मैं तुझे? खुद को कैसे मनाऊं? कुछ तो बता दो?
तुम्हे पता है जो चोट खाता है वो किसी से कहकर जी लेता है लेकिन जो चोट देता है वो घुट घुट कर हर पल मरता रहता है, जैसे मैं इस वक़्त मर रहा हूँ लेकिन कहीं न कहीं तुम मुझे अकेले छोड़कर बड़ा गुनाह किया है मेरे साथ।
जब तुम्हे जरूरत थी तब मैं हमेशा हाथ थामे रहा लेकिन मेरे वक़्त पर तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया क्यों आखिर कहां मैंने कमी की थी? बता सकती हो? तो बताओ?
अब जिसने भी चोट दिया हो वो तो झेलेगा ही! चाहे हम हों या तुम!
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